अस्तित्व बचाने की आर-पार की जंग: गरियाबंद में विशेष पिछड़ी ‘कमार’ जनजाति एवं आदिवासी समाज का अन्न-जल त्याग आंदोलन।

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अस्तित्व बचाने की आर-पार की जंग: गरियाबंद में विशेष पिछड़ी ‘कमार’ जनजाति एवं आदिवासी समाज का अन्न-जल त्याग आंदोलन।


गरियाबंद। “जल-जंगल-जमीन के रक्षकों को बिना वजह जेल भेजना बंद करो, निर्दोष आदिवासियों पर झूठे मुकदमे वापस लो!” इन तीखे नारों और ‘जय बुढ़ाराजा’ के पारंपरिक जयघोष के साथ बुधवार, 10 जून 2026 से जिला मुख्यालय का गांधी मैदान एक ऐतिहासिक आंदोलन का गवाह बन गया है। अतिविशिष्ट पिछड़ी जनजाति ‘कमार’ समुदाय और समस्त आदिवासी समाज ने अपने संवैधानिक अधिकारों, आत्मसम्मान और अस्तित्व की रक्षा के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का शंखनाद कर दिया है।इस आंदोलन को तब और बड़ी ताकत मिली, जब आदिवासियों के दर्द को साझा करने जिला पंचायत सदस्य श्रीमती लोकेश्वरी भी खुद गांधी मैदान पहुंचीं और प्रदर्शनकारियों के साथ भूख हड़ताल पर बैठ गईं। विकासखंड मैनपुर के दूरस्थ अंचल कुल्हाड़ीघाट समेत पूरे जिले से आए आदिवासियों की आंखों में वन विभाग की मनमानी के खिलाफ भारी आक्रोश साफ दिखाई दे रहा है।अखबार की सुर्ख़ियों के लिए प्रमुख बिंदु:वन विभाग की मनमानी पर सीधा वार: आंदोलनकारियों का आरोप है कि वन विभाग आदिवासियों को बेवजह प्रताड़ित कर रहा है और झूठे मामलों में फंसाकर सलाखों के पीछे भेज रहा है।

अस्तित्व बचाने की आर-पार की जंग: कमार समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के वजूद और आदिवासी अस्मिता को बचाने की अंतिम लड़ाई है।जनप्रतिनिधि का मिला साथ: जिला पंचायत सदस्य श्रीमती लोकेश्वरी की सक्रिय भागीदारी ने इस आंदोलन को और अधिक मजबूत और प्रखर बना दिया है।अन्न-जल त्यागने का संकल्प: प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक निर्दोषों पर दर्ज झूठे केस बंद नहीं होते और समान न्याय का लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक आंदोलनकारी अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करेंगे।

गांधी मैदान में डटे आदिवासियों के इस अनुशासित और आक्रामक तेवर ने जिला प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस सुलगती हुई जमीनी आवाज को सुनने में कितनी तत्परता दिखाता है।

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