

नशा हल्का, जेब पर भारी वार — अमलीपदर की सरकारी भट्टी पर उठे सवाल । ₹20 के अतिरिक्त खेल पर सबकी नजर ।
गरियाबंद जिले के अमलीपदर में सरकारी शराब दुकान इन दिनों चर्चा में है। वजह नशे का असर नहीं, बल्कि दाम का असर है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ शराब खरीदते ही पहले जेब हल्की होती है, नशा तो बाद की बात है।
मामला सिर्फ ओवररेटिंग तक सीमित नहीं है। आरोप है कि निर्धारित मूल्य से ज्यादा वसूली आम बात हो गई है। ₹200 की बियर ₹220 में और ₹160 का कैन ₹180 में बेचा जा रहा है। ग्राहक बिना सवाल किए पैसे दे रहे हैं, मानो यही नया रेट हो।
*कैमरा आया तो बदला खेल*
एक वीडियो सामने आने के बाद स्थिति थोड़ी बदली। कैमरा देखते ही कर्मचारी ने ₹20 वापस कर दिए। इससे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर कैमरे के सामने पैसा लौट सकता है, तो बिना कैमरे के रोज़ कितनी अतिरिक्त वसूली हो रही होगी?
*सील पर भी संदेह*
कुछ ग्राहकों ने शराब की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शोले मसाला दारू बोतलों के ढक्कन ढीले मिल रहे हैं और नशे का असर पहले जैसा नहीं है। इससे मिलावट या छेड़छाड़ की आशंका भी जताई जा रही है।
*भट्टी से चौक तक ‘डबल मार’*
स्थानीय लोग यह भी बताते हैं कि दुकान से निकलते ही रास्ते में पुलिस चेकिंग का सामना करना पड़ता है। यानी एक तरफ ज्यादा दाम की मार, दूसरी तरफ जुर्माने का डर—खर्चा दोगुना और परेशानी तिगुनी।
*डरे हुए ग्राहक*
हालात ऐसे हैं कि अब कई लोग शाम होते ही सोच में पड़ जाते हैं कि दुकान जाएं या नहीं। दुकान पर ओवररेटिंग का डर, रास्ते में कार्रवाई का डर और घर पहुंचने पर अलग तनाव।
क्षेत्र के आबकारी अधिकारी रजत कुमार ठाकुर ने साफ कहा है कि तय मूल्य से ₹1 भी अधिक लेना गलत है और मामले की जांच की जाएगी।
लोगों का कहना है कि सिर्फ जांच नहीं, ठोस कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारी दुकानें ही अब ओवररेटिंग का केंद्र बनती जा रही हैं?
क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर सिस्टम के भीतर चल रहा कोई खेल?
सरकार को मिलने वाला राजस्व कम पड़ रहा है या कुछ लोग निजी लाभ को प्राथमिकता दे रहे हैं?
अमलीपदर की इस सरकारी दुकान ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर सख्त कदम उठाता है या फिर यह “₹20 का खेल” यूं ही चलता रहेगा।











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