
मथुरा गांव की ऐतिहासिक फागु दशमी परंपरा ।
सदियों पुरानी संस्कृति को सहेजने में जुटे ग्रामीण, देशभर में अनोखी पहचान ।
कालाहांडी|गरियाबंद जिले से सटे उड़ीसा के कालाहांडी जिले का मथुरा गांव इन दिनों अपनी सदियों पुरानी फागु दशमी और फागु यात्रा परंपरा को लेकर एक बार फिर चर्चा में है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि ग्रामीणों की सामूहिक आस्था, सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं को संरक्षित रखने की जीवंत मिसाल है। होली से चार दिन पूर्व फागु दशमी के दिन से आरंभ होने वाला यह महोत्सव आज भी उसी मूल स्वरूप में आयोजित किया जाता है, जैसा वर्षों पहले पूर्वजों द्वारा स्थापित किया गया था।

उत्सव की शुरुआत भगवान राधा-कृष्ण की विधिवत पूजा-अर्चना से होती है। पूजा के पश्चात उन्हें सुसज्जित झूले में विराजित कर झुलाया जाता है। प्रतिदिन प्रातः भगवान पूरे गांव का परिक्रमण करते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से ओत-प्रोत हो उठता है। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होकर इस दिव्य यात्रा का हिस्सा बनते हैं।
झूला उत्सव के बाद आरंभ होता है सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अद्वितीय सिलसिला, जिसकी सबसे बड़ी पहचान है सदियों पुरानी “सीन और स्क्रीन” परंपरा। एक साधारण सफेद परदे के पीछे कलाकार नृत्य, हास्य और लोक प्रस्तुतियां देते हैं। विशेष बात यह है कि जब गांव में बिजली की सुविधा नहीं थी, तब पूर्वज मसालों (मशालों) की रोशनी में इन प्रस्तुतियों का मंचन करते थे। आज तकनीक के 5G युग में भी ग्रामीण उसी पारंपरिक शैली को जीवित रखे हुए हैं। आधुनिक संसाधनों के बावजूद पुरातन विधि को बनाए रखना ही इस आयोजन की आत्मा है।
चार से पांच दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में उड़िया नाटक का मंचन भी किया जाता है, जो स्थानीय लोकसंस्कृति और सामाजिक संदेशों को सशक्त रूप से प्रस्तुत करता है। दूसरे दिन से अंतिम दिन तक ग्राम की इष्ट देवी माता लंकेश्वरी और भगवान बुढा राजा के प्रतिनिधियों का आगमन होता है, जिनका पारंपरिक बाजे गाजे के साथ स्वागत किया जाता है। इस अनुष्ठान को देखने और दर्शन करने के लिए आसपास के गांवों सहित छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यह उत्सव केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। उल्लेखनीय है कि इस भव्य आयोजन के लिए किसी प्रकार का चंदा नहीं लिया जाता। भगवान के नाम दर्ज संपत्तियों से होने वाली आय से ही संपूर्ण कार्यक्रम संपन्न किया जाता है। जहां छोटे आयोजनों के लिए भी चंदा आवश्यक हो जाता है, वहीं इतनी बड़ी परंपरा का आत्मनिर्भर ढंग से संचालन अपने आप में अनुकरणीय उदाहरण है।
उत्सव के दौरान पूरा गांव रोशनी से जगमगा उठता है। बाहर रोजगार या शिक्षा के लिए गए ग्रामीण भी इन दिनों अपने गांव लौटकर सहभागिता निभाते हैं। पारंपरिक वेशभूषा, पुराने समय का श्रृंगार और पारंपरिक मेकअप—सब कुछ उसी ऐतिहासिक शैली में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस परंपरा के कुछ दृश्य बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी प्रेरणा के रूप में देखे गए हैं। हालांकि गांववासी इसे प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक गरिमा का सम्मान मानते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य परंपरा को सुरक्षित रखना और नई पीढ़ी को इसकी महत्ता से परिचित कराना है।
यह मंच गांव के बच्चों और युवाओं के लिए प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर भी प्रदान करता है। कम उम्र से ही उन्हें नृत्य, अभिनय और हास्य प्रस्तुतियों के माध्यम से मंच अनुभव मिलता है, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और भीतर का भय समाप्त होता है। ग्रामीणों का मानना है कि यही अभ्यास भविष्य में बड़े मंचों की तैयारी का आधार बनता है।
आज जब आधुनिकता की आंधी में अनेक परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं, ऐसे समय में मथुरा गांव के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं। आवश्यकता है कि ऐसी ऐतिहासिक और अनोखी परंपराओं को सरकारी संरक्षण और व्यापक प्रोत्साहन मिले, ताकि यह अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।
फागु दशमी की यह परंपरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सामूहिक संकल्प की जीवंत गाथा है—जिसे मथुरा गांव के ग्रामीण पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।











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