
जनता के करोड़ों रुपये बर्बाद क्यों करती हैं सरकारें?
करोड़ों खर्च के बावजूद योजनाएं क्यों हो जाती हैं फेल?
छत्तीसगढ़ की गोठान योजना बना बड़ा उदाहरण।
गरियाबंद|छत्तीसगढ़ में सरकारें लगातार जनता के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं, लेकिन जब योजनाओं का वास्तविक परिणाम सामने आता है तो तस्वीर बेहद निराशाजनक दिखाई देती है। सवाल यह है कि आखिर जनता की मेहनत की कमाई, टैक्स का पैसा और सरकारी बजट आखिर किसके लिए खर्च होता है? और यदि योजनाएं जमीन पर सफल नहीं होतीं, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
ऐसा ही एक बड़ा मामला छत्तीसगढ़ की बहुचर्चित गोठान योजना का सामने आया है, जिसे पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बड़े स्तर पर लागू किया गया था। योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन को व्यवस्थित रखना, गोबर खरीदी कर वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन को बढ़ावा देना और ग्रामीण रोजगार के अवसर तैयार करना बताया गया था।

लेकिन आज स्थिति यह है कि करोड़ों की लागत से बनी यह योजना कई जगहों पर सिर्फ कागजों और सरकारी फाइलों तक सीमित होकर रह गई है।
विधानसभा में सरकार ने खुद स्वीकार किए 9790 गोठान
पूर्व कांग्रेस सरकार द्वारा विधानसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, राज्य में लगभग 9790 गोठानों का निर्माण कराया गया था। इन गोठानों को बनाने में सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च किए गए।

लेकिन अब बड़ा सवाल यह उठता है कि जब हजारों की संख्या में गोठान बनाए गए, तो फिर वे सफल क्यों नहीं हुए? क्यों आज कई गांवों में गोठान जर्जर पड़े हैं, खाली पड़े हैं या फिर अधूरे निर्माण के कारण उपयोग में ही नहीं आ रहे?
अधूरे निर्माण ने खोली योजना की पोल
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति देखने पर यह स्पष्ट होता है कि कई स्थानों पर गोठान योजना के तहत आवश्यक सुविधाएं आज तक पूरी नहीं की जा सकीं।

कई गांवों में वर्मी कम्पोस्ट टैंक ही नहीं बन पाए। कहीं पशुओं के लिए पानी पीने हेतु वाटर टैंक का निर्माण अधूरा है। कहीं बोर खनन नहीं कराया गया, तो कहीं ग्राउंड लेवलिंग (गरिदी) ही नहीं की गई।
इतना ही नहीं, कई जगहों पर गोठान के अंतर्गत बनने वाला कांट्रेक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे शेड, बाउंड्री, स्टोरेज व्यवस्था, प्लेटफॉर्म, बिजली-पानी जैसी सुविधाएं अधूरी रह गईं।
योजना का मूल उद्देश्य था कि गोठान में गोबर संग्रहित कर कम्पोस्ट तैयार की जाए, जिससे किसानों को जैविक खाद मिले और ग्रामीणों को रोजगार भी मिले। लेकिन जब आधारभूत ढांचा ही तैयार नहीं हो पाया, तो योजना सफल कैसे होती?
करोड़ों खर्च, लेकिन परिणाम शून्य
गोठान योजना पर सरकारी स्तर पर भारी-भरकम राशि खर्च की गई, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई गोठान आज बेकार पड़े ढांचे बनकर रह गए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि गोठान बनने के बाद कुछ महीनों तक गतिविधि दिखी, लेकिन धीरे-धीरे गोठान में न तो रख-रखाव हुआ और न ही कोई स्थायी व्यवस्था बनी। परिणामस्वरूप कई गोठान उपयोग के बिना ही उजड़ गए।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती योजनाएं?
यह मामला केवल योजना की असफलता नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी कमजोरी को उजागर करता है। जनता के बीच यह चर्चा अब आम हो गई है कि ऐसी योजनाएं अक्सर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।

लोगों का सवाल है कि जब निर्माण अधूरा है, सुविधाएं गायब हैं और उपयोग शून्य है, तो आखिर खर्च की गई राशि गई कहां?
क्या ठेकेदारों को भुगतान कर दिया गया?
क्या कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र बिना काम के जारी कर दिए गए?
क्या अधिकारियों की निगरानी केवल कागजों तक सीमित रही?
ये सवाल अब जनता पूछ रही है और जवाब मांग रही है।
जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि करोड़ों की योजना असफल हुई, तो जिम्मेदार कौन है?
और यदि जिम्मेदार है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
किसी भी सरकारी योजना की असफलता केवल सरकार की विफलता नहीं होती, बल्कि यह सीधे जनता के पैसों की बर्बादी होती है। फिर भी न तो जांच होती है, न ही दोषियों पर कड़ी कार्रवाई दिखाई देती है।

जनता का कहना है कि यदि आम व्यक्ति सरकारी राशि का दुरुपयोग करे तो तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन जब सरकारी योजनाओं में करोड़ों का नुकसान होता है, तो जिम्मेदार बच जाते हैं।
गांवों में बने गोठान अब बन रहे बोझ
कई गांवों में गोठान अब ग्रामीण विकास का केंद्र बनने के बजाय खाली मैदान और टूटे-फूटे ढांचे बन चुके हैं। कुछ जगहों पर गोठान में झाड़ियां उग आई हैं, कहीं निर्माण सामग्री बिखरी पड़ी है, तो कहीं पूरा परिसर वीरान हो चुका है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि योजना सही तरीके से लागू होती तो आज गोठान से गांव में रोजगार, जैविक खेती और पशुपालन को मजबूती मिलती। लेकिन लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण यह योजना दम तोड़ती नजर आ रही है।
जनता मांग रही जांच और कार्रवाई
अब आवश्यकता है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। यह पता लगाया जाए कि किस जिले में कितने गोठान बने, कितने पूर्ण हुए और कितने अधूरे रह गए। साथ ही निर्माण लागत, भुगतान प्रक्रिया और गुणवत्ता की भी जांच हो।
यदि भ्रष्टाचार सामने आता है, तो दोषी अधिकारियों, ठेकेदारों और संबंधित लोगों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
निष्कर्ष: योजनाएं बनती हैं नाम के लिए, बिगड़ती हैं सिस्टम के कारण
गोठान योजना का उद्देश्य अच्छा था, लेकिन क्रियान्वयन में हुई लापरवाही, भ्रष्टाचार और निगरानी की कमी ने इसे असफल बना दिया।
आज यह योजना छत्तीसगढ़ में एक बड़ा उदाहरण बन चुकी है कि कैसे सरकारी योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जनता को कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता।
अब जनता पूछ रही है—
क्या सरकारें केवल योजनाओं के नाम पर जनता का पैसा खर्च कर अपनी पीठ थपथपाती रहेंगी?
या फिर अब जवाबदेही तय होगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी?
यह सवाल केवल गोठान योजना का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम












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